Friday, April 28, 2017

Basic rules to be followed in Reiki

Basic rules of Reiki


1. Do not develop the attitude of arrogance.
Remember ur not a healer. U r just a channel. Instead of developing d arrogant attitude, always follow the attitude of gratitude. Gratitude to Universe , God, angels, Masters n guides for empowering  u nchoosing u as a channelto heal others.

2. U r not a doctor:
Do not ever discourage ur clients or fly to consult a doctor. Always be clear with ur  clients ABT what to expect without giving false hopes. Do not diagnosis. U r a channel to heal . Leave diagnosing to doctor. 
Yes, scanning the aura to check blockages and impurities is must, so that we can heal the related organs and Chakras. Though reiki can heal most disease, do not ask ur clients to stop medications.

3. Do not fires reiki on anyone: 
If someone doesn't want reiki , they say no to it than do not give them reiki. Let them decided what us best for TheM and what is for their highest good. If they refuse and u still give reiki, their soul n higher -self WL not accept the headlong. It is like someone closing door on ur face n u cannot enter. In case of emergency u can take permission fr their higher - self and soul to accept the healing.

4. No free reiki:
You cannot give free reiki, unless of course  there is some emergency. It may end up accumalating karmic debt for both healer and d client. The circuit is only complete when u give n receive. Generally, things given for free lose its value and importance. So respect reiki and always ask for energy exchange.

5. Do not get attachedto d outcome:
Just give reiki with pure heart n pure intention. Do not get attached ti d result. It may cause doubt in ur mind n ur subconscious mind starts wondering if u WL get d positive outcome or not. Best is give reiki n HV faith that it Wil work for highest good at the right time. U r reiki channel, u HV a power of healing but when and how is decided by the Universe.

6. Be ethical:- As a healer or a teacher, follow ethics. Asa healer it is ur duty to be honest with ur client and not to give the false hopes. It is your duty to tell them what to expect aand show the right direction. AS a teacher, just do onething:TEACH FROM HEART.Teach in such a way that ur words and guidance stays with ur students forever. Ditch te attitude of jealousy and competition.

7.Never get attached to your client and never say whatever negativities which are in my clients i accept them.(most important point of all)

कपूर मंत्र का अर्थ ओर फ़ायदे ।


कर्पूरगौरं मंत्र......

*जानिए आरती के बाद क्यों बोलते हैं कर्पूरगौरं मंत्र :*
किसी भी मंदिर में या हमारे घर में जब भी पूजन कर्म होते हैं तो वहां कुछ मंत्रों का जप अनिवार्य रूप से किया जाता है, सभी देवी-देवताओं के मंत्र अलग-अलग हैं, लेकिन जब भी आरती पूर्ण होती है तो यह मंत्र विशेष रूप से बोला जाता है l

*कर्पूरगौरं मंत्र :*
*कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा बसन्तं हृदयारबिन्दे भबं भवानीसहितं नमामि।।*
*ये है इस मंत्र का अर्थ :*
*इस मंत्र से शिवजी की स्तुति की जाती है। इसका अर्थ इस प्रकार है :*
*कर्पूरगौरं-* कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले।
*करुणावतारं-* करुणा के जो साक्षात् अवतार हैं।
*संसारसारं-* समस्त सृष्टि के जो सार हैं।
*भुजगेंद्रहारम्-* इस शब्द का अर्थ है जो सांप को हार के रूप में धारण करते हैं।
*सदा वसतं हृदयाविन्दे भवंभावनी सहितं नमामि-* इसका अर्थ है कि जो शिव, पार्वती के साथ सदैव मेरे हृदय में निवास करते हैं, उनको मेरा नमन है।

*मंत्र का पूरा अर्थ :-*
जो कर्पूर जैसे गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, वे भगवान शिव माता भवानी सहित मेरे ह्रदय में सदैव निवास करें और उन्हें मेरा नमन है।

*यही मंत्र क्यों….*
किसी भी देवी-देवता की आरती के बाद कर्पूरगौरम् करुणावतारं….मंत्र ही क्यों बोला जाता है, इसके पीछे बहुत गहरे अर्थ छिपे हुए हैं। भगवान शिव की ये स्तुति शिव-पार्वती विवाह के समय विष्णु द्वारा गाई हुई मानी गई है। अमूमन ये माना जाता है कि शिव शमशान वासी हैं, उनका स्वरुप बहुत भयंकर और अघोरी वाला है। लेकिन, ये स्तुति बताती है कि उनका स्वरुप बहुत दिव्य है। शिव को सृष्टि का अधिपति माना गया है, वे मृत्युलोक के देवता हैं, उन्हें पशुपतिनाथ भी कहा जाता है, पशुपति का अर्थ है संसार के जितने भी जीव हैं (मनुष्य सहित) उन सब का अधिपति। ये स्तुति इसी कारण से गाई जाती है कि जो इस समस्त संसार का अधिपति है, वो हमारे मन में वास करे। शिव श्मशान वासी हैं, जो मृत्यु के भय को दूर करते हैं। हमारे मन में शिव वास करें, मृत्यु का भय दूर हो।